Wednesday, 5 May 2021

विद्योत्तमा छंद पर आधारित सुशीला जोशी विद्योत्तमा जी की रचना


संजय कौशिक 'विज्ञात' जी द्वारा आविष्कृत 'विद्योत्तमा छंद' पर आधरित रचना

विद्योत्तमा छंद मापनी 

212  222, 222  212  21 ......... 


नफ़रतें करते हैं, हम खुद से भी अधिक आज।

वार सहते कितने, तुम समझो तो तनिक आज।।


भाव से जोड़े हिय, कविता उत्तम वही छंद।

पंक्ति चमकें नभ में, ज्यूँ तारों मध्य में चंद।।


पिंजरे तोड़े सब, ताकत रखता वही काव्य।

लेखनी दौड़ी अब, भावुक विद्योत्तमा भाव्य।।


कृष्ण राधा सी ये, पावन कविता लगे भाव।

और ये आस्था से, भरके तैरे नदी नाव।।


भक्ति गुरुवर की है, मेरे निखरे हुए छंद।

ज्ञान नौका चलती, बहती सी जो दिखे मंद।।


सुशीला जोशी 'विद्योत्तमा'

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दूसरी रचना


212 222, 222 212  21


कल्पना सी दिखती , कविता की साधना  मूक  ।

अब तलक भी खिल कर, करती है याचना चूक  ।।


रोज देखो होता , अपमानित अर्चना  थाल ।

हर समय झुकते है ,सज्जित से  राजसी भाल ।।


है समर्पित आपको, हुलसी सी  चाहना की रीत ।

जो हमेशा चाहे , चहकी सी सदा ही  प्रीत ।। 


दर्प की झूठी छवि ,जब भी उर में  पली जीत ।

हार बैठी अपना, सबकुछ ही जीत कर मीत ।।


कामना करते थे ,देख उनका हाल बेहाल ।

देखते जब उनको  , दिल पकड़े चाह की चाल ।।


सुशीला जोशी 'विद्योत्तमा'

Tuesday, 4 May 2021

शांता छंद आधारित बाबूलाल शर्मा, बौहरा,विज्ञ जी की रचनाएँ

 

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~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_
श्री संजय कौशिक विज्ञात प्रदत्त-


.       🦢 *शांता छंद* 🦢
मापनी- १२२ १२२ २२ वाचिक


••• *विजन वात वह वातायन* •••
.             ••••••••
कठिन पथ सुयश का साथी
सरल है क्षणिक सुख मिलना।
अगम दल कमल खुशियों के
सुगम नित सुमन का खिलना।

वहम वर सुखद जीवन का
व्यथित वह रहा कर मन को
मरण तय नियम प्राकृत का
दुखित नित रहा कर तन को।

व्यजन व्यंजना वर विमला
विजन वात वह वातायन।
चकित चक्षु चंचल चर चितवन
कलम कामिनी कविता मन।

परम पूज्य पावन पाहन
पलक पुण्य पारावर पल।
जलज जाल जंगल जीवन
जलद जीव जंगम जन जल।
.           🦢🦢🦢
..  ✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा,विज्ञ
सिकन्दरा, दौसा, राजस्थान


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दूसरी रचना

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~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_
श्री संजय कौशिक विज्ञात प्रदत्त-


.      *...शांता छंद...*
मापनी- १२२ १२२ २२ वाचिक


•••• *दुखद पुरवाई* ••••
लगी है पवन अब सुलगी
धरा पर अगन बरसाती।
किसी को तपन ज्वर भारी
कहीं है दुखित तन छाती।

बही है दुखद पुरवाई,
विरह मन सहित यह पगली।
मिलन कब स्वजन से होना,
सुनेंगें कथा क्या अगली।

महामारियाँ सुनते थे,
अभी यह सहन की हमने।
बताते यही है औषध,
सजग रह यत्न कर अपने।

गुजारो कठिन पल साथी,
समर यह समझ कर भारी।
बहेगी सरित फिर पावन
सँभाले गगन छत धारी।
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.....✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा विज्ञ
सिकन्दरा, दौसा राजस्थान
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कुमकुम छंद आधारित बाबूलाल शर्मा बौहरा, विज्ञ जी की रचनाएँ

 

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~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
श्री संजय कौशिक विज्ञात प्रदत्त-


.          *कुमकुम छंद*
मापनी- २१२ २२२ प्रति चरण
वाचिक मात्रा भार मान्य
चार चरण, समचरण समतुकांत


*नवगीत - बिछुड़ते मीत गए*
.            °°°°°°°
गीत बन ढाल रहे
.स्वप्न दुख जीत गए
संग साथी कोविड
.       बिछुड़ते मीत गये

देश पर देश खबर
.  काग हँस चील रहे
.    मौन कोकिला हुई
.    काल डस ब्याल रहे
.       लाश लावारिश सब
मेघ कह शोक गये।
संग साथी कोविड़ 
बिछुड़ते मीत गए।।

शून्य  के पंथ चले
. रीत रो प्रीत पड़ी
.   मानवी भाव बना
.   संग है रोग कड़ी
.      दूरियाँ नष्ट हुई 
धूप ले प्रात गये।
संग साथी कोविड
बिछुड़ते मीत गए।।

खेत में धान पके
. ले किसान कब दवा
.    तीर विष धार लिए
.       मौन ले साध हवा
.      होंठ सूख कर स्वयं
अश्रु बह रीत गये।
संग साथी कोविड
बिछुड़ते मीत गए।।

देव ये स्वर्ग बसे
.   काल के दूत भ्रमे
.     रक्त बीज बन रहे
.       गंध विष घोल चले
.   नव विषाणु विरह के
खिल रहे क्लेश नये
संग साथी कोविड
बिछुड़ते मीत गए।।
.         °°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान


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दूसरी रचना

👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_
श्री संजय कौशिक विज्ञातजी प्रदत्त-


.     🦢 *कुमकुम छंद* 🦢
मापनी- २१२ २२२ प्रतिचरण वाचिक
चार चरण, समचरण समतुकांत


.🌼 *याद रह जाएगी* 🌼
.              ••••••••••
आस तुम पर बचती, साँस तुम से चलती।
जब चले तन राही, तुम रहो सच खिलती।

छंद तुम पर लिख दूँ, मेघ बन के सावन।
गीत  नित्य  रचेंगे, पीर   बन  के  पावन।

गीत तुम संग सजे, छंद सतरंग लिखे।
मौन मन चंग धरे, गीत  जब  ढंग रखे।

नींद  तय  आएगी, मौत  को  लाएगी।
छंद   शेष   रहेंगे, याद   रह   जाएगी।

अश्रु रोक कर रखें, धैर्य धार तुम रहो।
छंद गीत बन रहूँ, रीति प्रीति मय बहो।

जन्म और जब मिले, प्रेम रंग फिर जमें।
याद  तुम  आओगी, बात  याद कर हमें।
.               🦢🦢🦢
....✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा,विज्ञ
सिकंदरा, दौसा, राजस्थान
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Wednesday, 28 April 2021

विज्ञ छंद पर बाबूलाल शर्मा , बौहरा, विज्ञ जी की रचना


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आ. संजय कौशिक विज्ञात जी का आविष्कृत-

.                🦢 *विज्ञ छंद*  🦢

विधान:-  वर्णिक छंद है १४ वर्ण का

२२१ २२२, १२२ १२२ २२

तगण मगण, यगण यगण गुरु गुरु

६, ८  वर्ण पर यति रहे

५, १२, व १७ वीं मात्रा लघु अनिवार्य है।

गुरु = लघु लघु संभव है

चार चरण, दो पंक्ति सम चरण सम तुकांत हो।

विज्ञ छंद में मापनी का वाचिक रूप भी मान्य है।


.             🌼 *हनुमान बजरंगी* 🌼

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हनुमान   बालाजी, दुलारे  लखन  राघव  के।

प्रभु आप की महिमा, सुनाएँ परम-लाघव के।।


सुग्रीव  सम  संगी, बनाए  भलुक कपि सारे।

अंगद  रखे  तारा, व  बाली  सहज प्रभु मारे।।


ढूँढी  सिया  माता, गये तुम जलधि तर खारे।

धीरज  बँधाया  था, सिया ने तनय कह तारे।।


रावण  महा पापी, धरा सुर जलधि भय शंका।

अभिमान कुचला था, जलाए नगर गढ़ लंका।।


लक्ष्मण हुए मूर्छित, पवन सुत मरुतगति धाए।

हनुमान  बजरंगी, सजीवन गिरि सहित  लाए।।


राक्षस  सभी  मारे, विभीषण प्रजा प्रतिपाली।

लौटे  अयोध्या  तब, मनी  घर  नगर दीवाली।।

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बाबू लाल शर्मा,बौहरा,विज्ञ

सिकन्दरा, दौसा, राजस्थान


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दूसरी रचना 

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~~~~~~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_

श्री संजय कौशिक विज्ञातजी द्वारा आविष्कृत-

.              🦢 *विज्ञ छंद* 🦢

~मापनी- २२१ २२२, १२२ १२२ २२ वाचिक


यह गर्म लू चलती, भयानक  तपिश घर बाहर।

कुछ मित्र भी कहते,अचानक नगर की आकर।

आकाश रोता रवि, धरा शशि विकल हर माता।

यह  रोग  कोरोना, पराजित  मनुज थक गाता।


पितु मात छीने है, किसी  घर  तनय  बहु बेटी।

यह मौत का साया, निँगलता  मनुज  आखेटी।

मजदूर भूखे  घर, निठल्ले  स्वजन  जन  सारे।

बीमार जन शासन, चिकित्सक  पड़े  मन हारे।


तन साँस सी घुटती, सुने  जब खबर मौतों की।

मन फाँस बन चुभती, पराए  सुजन  गोतों की।

नाते  हुए  थोथे, विगत  सब  रहन ब्याजों  के।

ताले  जड़े  मुख  पर, लगे घर विहग बाजों के।

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बाबू लाल शर्मा,बौहरा,विज्ञ

सिकन्दरा, दौसा, राजस्थान

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Tuesday, 27 April 2021

समालखा के विज्ञात ने दिए साहित्य जगत को 106 नूतन छंद

समालखा पानीपत (हरियाणा) के सहित्यकार संजय कौशिक विज्ञात ने 106 नूतन छंदों का निर्माण कर हिन्दी साहित्य को एक अनुपम भेंट दी है। जिसकी कल्पना करना भी असंभव था उसे उन्होंने यथार्थ में कर दिखाया। कलम की सुगंध साहित्यिक मिशन के संस्थापक संजय कौशिक 'विज्ञात' ने सभी छंदों के नाम अपने द्वारा कवि कवयित्रियों को दिए गए उपनामों पर रखे हैं। अपने नाम का छंद पाकर कवि परिवार अत्यंत हर्षित है। शुभकानाओं के माध्यम से सभी ने गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी  का आभार व्यक्त किया और अनेकों छंदों पर रचनाएँ लिखी गई। 


 



पत्रकार सुरेश निरंकारी जी का बहुत बहुत आभार उन्होंने इस खबर को अपने वर्तमान पत्र में प्रकाशित किया 💐💐💐💐💐💐💐





पत्रकार सैनी जी का बहुत बहुत आभार उन्होंने अर्थ प्रकाश न्यूज पेपर में इस खबर को प्रकाशित किया।





मुम्बई के स्थाई निवासी समालखा भास्कर के पत्रकार अरविंद जी का हार्दिक आभार 🙏

कलमकारों द्वारा गुरुदेव को समर्पित शब्द सुमन खूबसूरत गीत और नवगीत के रूप में प्रेषित हुए। 







कलम की सुगंध परिवार के लिए हनुमान जन्मोत्सव द्विगुणित खुशियों भरा रहा। अनेक कलमकारों ने इन छंदों पर अपनी कलम चलाई ।अपने नाम का छंद पाकर कलमकारों के मन में अत्यंत खुशी है जो उन्होंने शुभकानाओं के रूप में प्रेषित की। सभी को हार्दिक बधाई 💐💐💐💐

साँची छंद पर इन्द्राणी साहू 'साँची' का गीत


 गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी द्वारा निर्मित साँची छंद पर गीत

साँची छंद
221 222 , 221 221 22
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हनुमान बजरंगी
है आप का ही सहारा ।
कर त्याग चिंता का
नित नाम जपती तुम्हारा ।।

हो वीर अतुलित तुम
हे भक्त सिय के दुलारे ।
बनकर सखा तुम ही
सुग्रीव के दुख निवारे ।
जो भी शरण आया
दुख से तुम्हीं ने उबारा ।
हनुमान बजरंगी
है आप का ही सहारा ।।

सुत अंजना के बन
मद भानु का तोड़ आए ।
रुकते न क्षण भर भी
जब भक्त तुमको बुलाए ।
प्रभु नाम जो जप ले
पाता वही तो किनारा ।
हनुमान बजरंगी
है आप का ही सहारा ।।

सिय सुधि तुम्हीं लाए
लंका दनुज की जलाए ।
उड़ते फिरे अंबर
सुभदा पवन सुत कहाए ।
पीड़ित पतित जन का
जीवन तुम्हीं ने सँवारा ।
हनुमान बजरंगी
है आप का ही सहारा ।।

नित नाम हनुमत लो
सियराम आशीष पाओ ।
श्री राम के प्रिय को
कर वंदना ही मनाओ ।
बिन नाम हनुमत के
जग में नहीं है गुजारा ।
हनुमान बजरंगी
है आप का ही सहारा ।।

         *इन्द्राणी साहू"साँची"*
         भाटापारा (छत्तीसगढ़)    
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आख्या छन्द पर अनिता सुधीर 'आख्या' का गीत




 गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी द्वारा निर्मित आख्या छन्द पर गीत

आख्या छन्द

212  222,  212  222 21

शारदे वाग्देवी, लेखनी को देतीं गान

है विधा ने ओढ़ी,चूनरी जो धानी लाल।
जो सजाएँ ज्ञानी,मुस्कुराया हिंदी काल।।
है निराले छंदों में,शिल्प का पूरा ये ज्ञान।
शारदे वाग्देवी,लेखनी को देतीं गान।।

थी खड़ी लाचारी,देखती बीमारी रोग।
लाभ लेते ज्ञानी,विद्वता भी देती योग।।
जो उठा है बीड़ा,उच्च हो भाषा का मान।
शारदे वाग्देवी, लेखनी को देतीं गान।।

नव्यता ले भाषा,ओढ़ती सज्जा को आज।
जो विधा को देखे,रागिनी ने छेड़े साज।।
*छंद आख्या* देखे ,दिव्यता भी धारे ध्यान।
शारदे वाग्देवी, लेखनी को देतीं गान।।

अनिता सुधीर आख्या